पाँवों से सर तक जैसे एक जनून
बेतरतीबी से बढे हुए नाखून
कुछ टेढ़े- मेढ़े बैंगे दागिल पाँव
जैसे कोई एटम से उजड़ा गाँव
टखने ज्यों मिले हुए रक्खे हों बाँस
पिंडलियाँ कि जैसे हिलती-डुलती काँस
कुछ ऐसे लगते हैं घुटनों के जोड़
जैसे ऊबड़-खाबड़ राहों के मोड़
गट्टों -सी जंघाएँ निष्प्राण मलीन
कटि, रीतिकाल की सुधियों से भी क्षीण
छाती के नाम महज़ हड्डी दस बीस
जिस पर गिन-चुनकर बाल खड़े इक्कीस
पुट्ठे हों जैसे सूख गए अमरुद
चुकता करते-करते जीवन का सूद
बाँहें ढीली-ढाली ज्यों सूखी डाल
अंगुलियाँ जैसे सूखी हुई पुआल
छोटी-सी गरदन रंग बेहद बदरंग
हर वक्त पसीने का बदबू का संग
पिचकी अमियों-से गाल लटे-से कान
आँखें जैसे तरकश के खुट्टल बान
माथे पर चिंताओं का एक समूह
भौहों पर बैठी हरदम यम की रूह
तिनकों-से उड़ते रहनें वाले बाल
विद्युत् परिचालित मखनातीसी चाल
बैठे तो फिर घंटे बैठ जाते हैं बीत
सोचते प्यार की रीत भविष्य अतीत
कितने अजीब हैं इनके भी व्यापार
इनसे मिलिए ये हैं दुष्यंत कुमार |
रचनाकाल : १९५५-५६, 'सूर्य का स्वागत 'से
दुष्यंत कुमार रचनावली ( भाग : एक )
9/02/2008
5/05/2008
शब्दों से कभी कभी काम नहीं चलता : त्रिलोचन
शब्दों से कभी कभी काम नहीं चलता
जीवन को देखा है
यहाँ कुछ और
वहाँ कुछ और
इसी तरह यहाँ-वहाँ
हरदम कुछ और
कोई एक ढ़ंग सदा काम नहीं करता
तुम को भी चाहूँ तो
छूकर तरंग
पकड़ रखूँ संग
कितने दिन कहाँ-कहाँ
रख लूँगा रंग
अपना भी मनचाहा रूप नहीं बनता ।
( ’ताप के ताये हुए दिन’ से)
जीवन को देखा है
यहाँ कुछ और
वहाँ कुछ और
इसी तरह यहाँ-वहाँ
हरदम कुछ और
कोई एक ढ़ंग सदा काम नहीं करता
तुम को भी चाहूँ तो
छूकर तरंग
पकड़ रखूँ संग
कितने दिन कहाँ-कहाँ
रख लूँगा रंग
अपना भी मनचाहा रूप नहीं बनता ।
( ’ताप के ताये हुए दिन’ से)
2/23/2008
प्रपात के प्रति : निराला
अंचल के चंचल क्षुद्र प्रपात !
मचलते हुए निकल आते हो;
उज्जवल! घन-वन-अंधकार के साथ
खेलते हो क्यों? क्या पाते हो ?
अंधकार पर इतना प्यार,
क्या जाने यह बालक का अविचार
बुद्ध का या कि साम्य-व्यवहार !
तुम्हारा करता है गतिरोध
पिता का कोई दूत अबोध-
किसी पत्थर से टकराते हो
फिरकर ज़रा ठहर जाते हो;
उसे जब लेते हो पहचान-
समझ जाते हो उस जड़ का सारा अज्ञान,
फूट पड़ती है ओंठों पर तब मृदु मुस्कान;
बस अजान की ओर इशारा करके चल देते हो,
भर जाते हो उसके अन्तर में तुम अपनी तान ।
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प्रपात के प्रति
2/15/2008
अलविदा के बाद : रवीन्द्र भट्ठल
तेरे जाने के पहले, सूरज उदास भी होता था
सूरज अस्त भी होता था
हर रोज़ रात सरों पर छत्र करती थी
सितारों की फुलकारी,
हवा गाती थी
धूप नृत्य करती थी.
अँधेरा अपने लम्बे सुर में मस्त था
हँसी की कूल थी, बोलों की बबूल थी
मुकद्दरों का साथ था,
चलनें की ज़ंजीर थी
उम्र बेफ़िक्र विचारों की फ़कीर थी
तेरे जाने से पहले ,दूध जैसा,
मोह जैसा सब कुछ था
और अलविदा के बाद............
{ओ-पंखुरी ! पंजाबी की श्रेष्ट कविताओं, से }
सूरज अस्त भी होता था
हर रोज़ रात सरों पर छत्र करती थी
सितारों की फुलकारी,
हवा गाती थी
धूप नृत्य करती थी.
अँधेरा अपने लम्बे सुर में मस्त था
हँसी की कूल थी, बोलों की बबूल थी
मुकद्दरों का साथ था,
चलनें की ज़ंजीर थी
उम्र बेफ़िक्र विचारों की फ़कीर थी
तेरे जाने से पहले ,दूध जैसा,
मोह जैसा सब कुछ था
और अलविदा के बाद............
{ओ-पंखुरी ! पंजाबी की श्रेष्ट कविताओं, से }
2/08/2008
प्रतीक्षा-गीत : अज्ञेय
हर किसी के भीतर
एक गीत सोता है
जो इसी का प्रतीक्षमान होता है
कि कोई उसे छू कर जगा दे
जमी परतें पिघला दे
और एक धार बहा दे।
पर ओ मेरे प्रतीक्षित मीत
प्रतीक्षा स्वयं भी तो है एक गीत
जिसे मैने बार बार जाग कर गाया है
जब-जब तुम ने मुझे जगाया है।
उसी को तो आज भी गाता हूँ
क्यों कि चौंक- चौंक कर रोज़
तुम्हें नया पहचानता हूँ-
यद्यपि सदा से ठीक वैसा ही जानता हूँ।
( सदानीरा , से )
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प्रतीक्षा-गीत
2/01/2008
सायंकाल : रधुवीर सहाय
"...बहरहाल, इस तरह की कोशिशें विचार वस्तु के दिल और दिमाग़ पर उतरनें के तरीक़े पर निर्भर रहेंगी और ज़रूरी है कि हम अपनी अनुभूति को उसी प्रकार सुधारें, ताकि कविता भी वैसी ही जानदार हो सके जैसी कि वे वास्तविकताएँ, जिन से हम कविता की प्रेरणा लेते हैं। विचार-वस्तु का कविता में खू़न की तरह दौड़ते रहना कविता को जीवन और शक्ति देता है; और यह तभी सम्भव है जब हमारी कविता की जड़ें यथार्थ में हों ।"
: रधुवीर सहाय :
खिंचा चला जाता है दिन का सोने का रथ
ऊँची-नीची भूमि पार कर
अब दिन डूब रहा है जैसे
कोई अपनी बीती बातें भुला रहा हो,
परती पर की दूब घास में अरज-अरझ कर
उजले-उजले अनबोये खेतों से हो कर
धूप अनमनी-सी वापस लौटी जाती है।
दूर क्षितिज पर महुओं की दीवार खड़ी है
जिस पर चढ़ कर सूरज का शैतान छोकरा
झाँक रहा है
चौडे़ चिकने पत्तों की ललछौर फुनगियों को सरका कर
नीड़ों में फिर लौटीं मँडराती पिड़कुलियाँ
निकल-निकल जाती हैं उस के चपल करों से
अब छायाएँ दौड़ गयी हैं लम्बी-लम्बी
फैल गया गोरी धरती पर झिंझरा-झिंझरा
चाँदी के काँटों वाला बाँका बबूल
निर्जल मेघों की हलकी छायाओं-जैसा ।
है खडा़ हुआ तन का खजूर
छाया का बोझा फेंक दूर निज मस्तक से
हारों से लौट रहे हैं जन
फैले-फैले मैदानों में बहने वाली
लग रहीं हवाएँ उन के चौडे़ सीनों से
उन के कंधों की लठिया जैसे सोने की
आगे-आगे गोरू जिन की चिकनी पीठों
पर साँझ बिछल कर चमक रही ।
लो होता श्रम का समय शेष
अब शीतल जल की चिन्ता में
लगती बहुओं की भीड़ कुँए पर
मँजी गगरियों पर से किरणें घूम-घूम
छिपती जातीं पनिहारिन के साँवल हाथों की चूड़ियों में
धीरे-धीरे झुकता जाता है शरमाये नयनों-सा दिन
छाया की पलकों के नीचे
लो डूब गया आलोक धवल
अम्बर में सातों रंग छोड़
वे रुके हुए,ऊदे मेघों की बाँहों में
हैं श्याम धरा,रंगीन गगन
हो गयी साँझ, सो रहा सत्य, जग रहे सपन।
’दूसरा सप्तक’ से
: रधुवीर सहाय :
खिंचा चला जाता है दिन का सोने का रथ
ऊँची-नीची भूमि पार कर
अब दिन डूब रहा है जैसे
कोई अपनी बीती बातें भुला रहा हो,
परती पर की दूब घास में अरज-अरझ कर
उजले-उजले अनबोये खेतों से हो कर
धूप अनमनी-सी वापस लौटी जाती है।
दूर क्षितिज पर महुओं की दीवार खड़ी है
जिस पर चढ़ कर सूरज का शैतान छोकरा
झाँक रहा है
चौडे़ चिकने पत्तों की ललछौर फुनगियों को सरका कर
नीड़ों में फिर लौटीं मँडराती पिड़कुलियाँ
निकल-निकल जाती हैं उस के चपल करों से
अब छायाएँ दौड़ गयी हैं लम्बी-लम्बी
फैल गया गोरी धरती पर झिंझरा-झिंझरा
चाँदी के काँटों वाला बाँका बबूल
निर्जल मेघों की हलकी छायाओं-जैसा ।
है खडा़ हुआ तन का खजूर
छाया का बोझा फेंक दूर निज मस्तक से
हारों से लौट रहे हैं जन
फैले-फैले मैदानों में बहने वाली
लग रहीं हवाएँ उन के चौडे़ सीनों से
उन के कंधों की लठिया जैसे सोने की
आगे-आगे गोरू जिन की चिकनी पीठों
पर साँझ बिछल कर चमक रही ।
लो होता श्रम का समय शेष
अब शीतल जल की चिन्ता में
लगती बहुओं की भीड़ कुँए पर
मँजी गगरियों पर से किरणें घूम-घूम
छिपती जातीं पनिहारिन के साँवल हाथों की चूड़ियों में
धीरे-धीरे झुकता जाता है शरमाये नयनों-सा दिन
छाया की पलकों के नीचे
लो डूब गया आलोक धवल
अम्बर में सातों रंग छोड़
वे रुके हुए,ऊदे मेघों की बाँहों में
हैं श्याम धरा,रंगीन गगन
हो गयी साँझ, सो रहा सत्य, जग रहे सपन।
’दूसरा सप्तक’ से
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सायंकाल
1/15/2008
उदास वक़्तों में : नवतेज भारती
उदास वक़्तों में भी, जुगनू लौ करते हैं
सितारे टिमटिमाते हैं
और कवि कविता लिखते हैं
उदास वक़्तों में भी
घास के तृण उगते हैं
पक्षी गाते और फूल खिलते हैं
उदास समय में भी
लोग सपने लेते हैं
दरिया बहते हैं और सूर्य उदय होता है
’ओ पंखुरी’ से
सितारे टिमटिमाते हैं
और कवि कविता लिखते हैं
उदास वक़्तों में भी
घास के तृण उगते हैं
पक्षी गाते और फूल खिलते हैं
उदास समय में भी
लोग सपने लेते हैं
दरिया बहते हैं और सूर्य उदय होता है
’ओ पंखुरी’ से
1/14/2008
शब्द रोशनी वाले : नवतेज भारती
जिस शब्द में से प्रकाश नही फूटता
उसको काग़ज़ पर मत रख
कोरा सफ़ेद काग़ज़
काले अक्षरों से ज़्यादा मोल का होता है.
’पंजाबी की श्रेष्ट प्रेम-कविताएं’ से
उसको काग़ज़ पर मत रख
कोरा सफ़ेद काग़ज़
काले अक्षरों से ज़्यादा मोल का होता है.
’पंजाबी की श्रेष्ट प्रेम-कविताएं’ से
जो चलते हैं : नवतेज भारती
यदि मैं चलता चलता रुक जाऊं
तब मेरे पांव ,उनको दे देना, जो चलते हैं
आंखे उनको, जो देखते हैं
दिल उनको, जो प्यार करते हैं.
’पंजाबी की श्रेष्ट प्रेम-कविताएं’ से
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जो चलते हैं,
नवतेज भारती
1/08/2008
एक भावना : हरिनारायण व्यास
पुरानी मान्यताओं, पुराने शब्दों, पुरानी कहावतों को नये अर्थ से विभूषित कर के कविता ,में प्रयोग करने से पाठक की अनुभूतियों को छूने में सहायता मिलती है।
हरिनारायण व्यास
**************
इस पुरानी ज़िन्दगी की जेल में
जन्म लेता है नया मन।
मुक्त नीलाकाश की लम्बी भुजाएँ
हैं समेटे कोटि युग से सूर्य, शशि, निहारिका के ज्योति-तन।
यह दुखी संसृति हमारी,
स्वप्न की सुन्दर पिटारी
भी इसी को बाहुओं में आत्म-विस्तृत, सुप्त निज में ही
सिमट लिपटी हुई है।
किन्तु मन ब्रहाण्ड इससे भी बडा़ है
जो कि जीवन कोठरी में जन्म लेता है नया बन
आज इस ब्रह्मान्ड में ही उठ रहा है
प्रेरणा का जन्म जीवन-भरा स्पन्दन-भरा
आषाढ़ का सुख-पूर्ण धन।
रुग्ण जन-जन,
युद्ध-पथ पर लड़खड़ाता हाँफता
हर चरण पर भीति से बिजली सरीखा काँपता
तोड़ने को आतुर हुआ यह शुद्र बन्धन
आँज कर पीले नयन में ज्योति का धुँधला सपन।
जल रही प्राचीनताएँ बाँध छाती पर मरण का एक क्षण
इस अँधेरे की पुरानी ओढ़नी को बेध कर
आ रही ऊपर नये युग की किरण।
( दूसरा सप्तक, से)
हरिनारायण व्यास
**************
इस पुरानी ज़िन्दगी की जेल में
जन्म लेता है नया मन।
मुक्त नीलाकाश की लम्बी भुजाएँ
हैं समेटे कोटि युग से सूर्य, शशि, निहारिका के ज्योति-तन।
यह दुखी संसृति हमारी,
स्वप्न की सुन्दर पिटारी
भी इसी को बाहुओं में आत्म-विस्तृत, सुप्त निज में ही
सिमट लिपटी हुई है।
किन्तु मन ब्रहाण्ड इससे भी बडा़ है
जो कि जीवन कोठरी में जन्म लेता है नया बन
आज इस ब्रह्मान्ड में ही उठ रहा है
प्रेरणा का जन्म जीवन-भरा स्पन्दन-भरा
आषाढ़ का सुख-पूर्ण धन।
रुग्ण जन-जन,
युद्ध-पथ पर लड़खड़ाता हाँफता
हर चरण पर भीति से बिजली सरीखा काँपता
तोड़ने को आतुर हुआ यह शुद्र बन्धन
आँज कर पीले नयन में ज्योति का धुँधला सपन।
जल रही प्राचीनताएँ बाँध छाती पर मरण का एक क्षण
इस अँधेरे की पुरानी ओढ़नी को बेध कर
आ रही ऊपर नये युग की किरण।
( दूसरा सप्तक, से)
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एक भावना,
हरिनारायण व्यास
12/26/2007
रुबाई : शमशेरबहादुर सिंह
हम अपने ख़्याल को सनम समझे थे
अपने को ख़्याल से भी कम समझे थे
’होना था’- समझना न था कुछ भी ’शमशेर’
होना भी कहाँ था वो जो हम समझे थे।
’दूसरा सप्तक’ से
अपने को ख़्याल से भी कम समझे थे
’होना था’- समझना न था कुछ भी ’शमशेर’
होना भी कहाँ था वो जो हम समझे थे।
’दूसरा सप्तक’ से
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रुबाई,
शमशेरबहादुर सिंह
11/30/2007
सूखे पीले पत्तों ने कहा - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
तेज़ी से जाते हुई कार के पीछे
पथ पर गिरे पड़े
निर्जीव सूखे पीले पत्तों ने भी
कुछ दूर दौड़ कर गर्व से कहा----
’हम में भी गति है,
सुनो, हम में भी जीवन है,
रुको-रुको हम भी
साथ चलते हैं
हम भी प्रगतिशील हैं।’
लेकिन उन से कौन कहे-
प्रगति, पिछलग्गूपन नहीं है
और जीवन, आगे बढ़ने के लिए
दूसरों का मुँह नहीं ताकता ।
पथ पर गिरे पड़े
निर्जीव सूखे पीले पत्तों ने भी
कुछ दूर दौड़ कर गर्व से कहा----
’हम में भी गति है,
सुनो, हम में भी जीवन है,
रुको-रुको हम भी
साथ चलते हैं
हम भी प्रगतिशील हैं।’
लेकिन उन से कौन कहे-
प्रगति, पिछलग्गूपन नहीं है
और जीवन, आगे बढ़ने के लिए
दूसरों का मुँह नहीं ताकता ।
9/14/2007
जयशंकर प्रसाद
सब जीवन बीता जाता है
धूप छाँह के खेल सदॄश
सब जीवन बीता जाता है
समय भागता है प्रतिक्षण में,
नव-अतीत के तुषार-कण में,
हमें लगा कर भविष्य-रण में,
आप कहाँ छिप जाता है
सब जीवन बीता जाता है
बुल्ले, नहर, हवा के झोंके,
मेघ और बिजली के टोंके,
किसका साहस है कुछ रोके,
जीवन का वह नाता है
सब जीवन बीता जाता है
वंशी को बस बज जाने दो,
मीठी मीड़ों को आने दो,
आँख बंद करके गाने दो
जो कुछ हमको आता है
सब जीवन बीता जाता है.
( प्रतिनिधि कविताएँ , से)
धूप छाँह के खेल सदॄश
सब जीवन बीता जाता है
समय भागता है प्रतिक्षण में,
नव-अतीत के तुषार-कण में,
हमें लगा कर भविष्य-रण में,
आप कहाँ छिप जाता है
सब जीवन बीता जाता है
बुल्ले, नहर, हवा के झोंके,
मेघ और बिजली के टोंके,
किसका साहस है कुछ रोके,
जीवन का वह नाता है
सब जीवन बीता जाता है
वंशी को बस बज जाने दो,
मीठी मीड़ों को आने दो,
आँख बंद करके गाने दो
जो कुछ हमको आता है
सब जीवन बीता जाता है.
( प्रतिनिधि कविताएँ , से)
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जयशंकर प्रसाद,
जीवन,
प्रसाद
8/28/2007
पन्द्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस : सुमित्रानंदन पंत
चिर प्रणम्य यह पुष्य अहन, जय गाओ सुरगण,
आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन !
नव भारत, फिर चीर युगों का तिमिर-आवरण,
तरुण अरुण-सा उदित हुआ परिदीप्त कर भुवन !
सभ्य हुआ अब विश्व, सभ्य धरणी का जीवन,
आज खुले भारत के संग भू के जड़-बंधन !
शान्त हुआ अब युग-युग का भौतिक संघर्षण,
मुक्त चेतना भारत की यह करती घोषण !
आम्र-मौर लाओ हे ,कदली स्तम्भ बनाओ,
पावन गंगा जल भर के बंदनवार बँधाओ ,
जय भारत गाओ, स्वतन्त्र भारत गाओ !
उन्नत लगता चन्द्र कला स्मित आज हिमाँचल,
चिर समाधि से जाग उठे हों शम्भु तपोज्वल !
लहर-लहर पर इन्द्रधनुष ध्वज फहरा चंचल
जय निनाद करता, उठ सागर, सुख से विह्वल !
धन्य आज का मुक्ति-दिवस गाओ जन-मंगल,
भारत लक्ष्मी से शोभित फिर भारत शतदल !
तुमुल जयध्वनि करो महात्मा गान्धी की जय,
नव भारत के सुज्ञ सारथी वह नि:संशय !
राष्ट्र-नायकों का हे, पुन: करो अभिवादन,
जीर्ण जाति में भरा जिन्होंने नूतन जीवन !
स्वर्ण-शस्य बाँधो भू वेणी में युवती जन,
बनो वज्र प्राचीर राष्ट्र की, वीर युवगण!
लोह-संगठित बने लोक भारत का जीवन,
हों शिक्षित सम्पन्न क्षुधातुर नग्न-भग्न जन!
मुक्ति नहीं पलती दृग-जल से हो अभिसिंचित,
संयम तप के रक्त-स्वेद से होती पोषित!
मुक्ति माँगती कर्म वचन मन प्राण समर्पण,
वृद्ध राष्ट्र को, वीर युवकगण, दो निज यौवन!
आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन !
नव भारत, फिर चीर युगों का तिमिर-आवरण,
तरुण अरुण-सा उदित हुआ परिदीप्त कर भुवन !
सभ्य हुआ अब विश्व, सभ्य धरणी का जीवन,
आज खुले भारत के संग भू के जड़-बंधन !
शान्त हुआ अब युग-युग का भौतिक संघर्षण,
मुक्त चेतना भारत की यह करती घोषण !
आम्र-मौर लाओ हे ,कदली स्तम्भ बनाओ,
पावन गंगा जल भर के बंदनवार बँधाओ ,
जय भारत गाओ, स्वतन्त्र भारत गाओ !
उन्नत लगता चन्द्र कला स्मित आज हिमाँचल,
चिर समाधि से जाग उठे हों शम्भु तपोज्वल !
लहर-लहर पर इन्द्रधनुष ध्वज फहरा चंचल
जय निनाद करता, उठ सागर, सुख से विह्वल !
धन्य आज का मुक्ति-दिवस गाओ जन-मंगल,
भारत लक्ष्मी से शोभित फिर भारत शतदल !
तुमुल जयध्वनि करो महात्मा गान्धी की जय,
नव भारत के सुज्ञ सारथी वह नि:संशय !
राष्ट्र-नायकों का हे, पुन: करो अभिवादन,
जीर्ण जाति में भरा जिन्होंने नूतन जीवन !
स्वर्ण-शस्य बाँधो भू वेणी में युवती जन,
बनो वज्र प्राचीर राष्ट्र की, वीर युवगण!
लोह-संगठित बने लोक भारत का जीवन,
हों शिक्षित सम्पन्न क्षुधातुर नग्न-भग्न जन!
मुक्ति नहीं पलती दृग-जल से हो अभिसिंचित,
संयम तप के रक्त-स्वेद से होती पोषित!
मुक्ति माँगती कर्म वचन मन प्राण समर्पण,
वृद्ध राष्ट्र को, वीर युवकगण, दो निज यौवन!
नव स्वतंत्र भारत, हो जग-हित ज्योति जागरण,
नव प्रभात में स्वर्ण-स्नात हो भू का प्रांगण !
नव जीवन का वैभव जाग्रत हो जनगण में,
आत्मा का ऐश्वर्य अवतरित मानव मन में!
रक्त-सिक्त धरणी का हो दु:स्वप्न समापन,
शान्ति प्रीति सुख का भू-स्वर्ग उठे सुर मोहन!
भारत का दासत्व दासता थी भू-मन की,
विकसित आज हुई सीमाएँ जग-जीवन की!
धन्य आज का स्वर्ण दिवस, नव लोक-जागरण!
नव संस्कृति आलोक करे, जन भारत वितरण!
नव-जीवन की ज्वाला से दीपित हों दिशि क्षण,
नव मानवता में मुकुलित धरती का जीवन !
नव प्रभात में स्वर्ण-स्नात हो भू का प्रांगण !
नव जीवन का वैभव जाग्रत हो जनगण में,
आत्मा का ऐश्वर्य अवतरित मानव मन में!
रक्त-सिक्त धरणी का हो दु:स्वप्न समापन,
शान्ति प्रीति सुख का भू-स्वर्ग उठे सुर मोहन!
भारत का दासत्व दासता थी भू-मन की,
विकसित आज हुई सीमाएँ जग-जीवन की!
धन्य आज का स्वर्ण दिवस, नव लोक-जागरण!
नव संस्कृति आलोक करे, जन भारत वितरण!
नव-जीवन की ज्वाला से दीपित हों दिशि क्षण,
नव मानवता में मुकुलित धरती का जीवन !
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१५ अगस्त,
सुमित्रानंदन पंत
7/17/2007
पर्वतारोही : रामधारी सिंह दिनकर
मैं पर्वतारोही हूँ।
शिखर अभी दूर है।
और मेरी साँस फूलनें लगी है।
मुड़ कर देखता हूँ
कि मैनें जो निशान बनाये थे,
वे हैं या नहीं।
मैंने जो बीज गिराये थे,
उनका क्या हुआ?
किसान बीजों को मिट्टी में गाड़ कर
घर जा कर सुख से सोता है,
इस आशा में
कि वे उगेंगे
और पौधे लहरायेंगे ।
उनमें जब दानें भरेंगे,
पक्षी उत्सव मनानें को आयेंगे।
लेकिन कवि की किस्मत
इतनी अच्छी नहीं होती।
वह अपनें भविष्य को
आप नहीं पहचानता।
हृदय के दानें तो उसनें
बिखेर दिये हैं,
मगर फसल उगेगी या नहीं
यह रहस्य वह नहीं जानता ।
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दिनकर,
पर्वतारोही
7/11/2007
ताजमहल की छाया में : अज्ञेय
मुझ में यह सामर्थ्य नहीं है मैं कविता कर पाऊँ,
या कूँची में रंगों ही का स्वर्ण-वितान बनाऊँ ।
साधन इतनें नहीं कि पत्थर के प्रसाद खड़े कर-
तेरा, अपना और प्यार का नाम अमर कर जाऊँ।
पर वह क्या कम कवि है जो कविता में तन्मय होवे
या रंगों की रंगीनी में कटु जग-जीवन खोवे ?
हो अत्यन्त निमग्न, एकरस, प्रणय देख औरों का-
औरों के ही चरण-चिह्न पावन आँसू से धोवे?
हम-तुम आज खड़े हैं जो कन्धे से कन्धा मिलाये,
देख रहे हैं दीर्घ युगों से अथक पाँव फैलाये
व्याकुल आत्म-निवेदन-सा यह दिव्य कल्पना-पक्षी:
क्यों न हमारा ह्र्दय आज गौरव से उमड़ा आये!
मैं निर्धन हूँ,साधनहीन ; न तुम ही हो महारानी,
पर साधन क्या? व्यक्ति साधना ही से होता दानी!
जिस क्षण हम यह देख सामनें स्मारक अमर प्रणय का
प्लावित हुए, वही क्षण तो है अपनी अमर कहानी !
रचनाकाल/स्थल : २० दिसम्बर १९३५, आगरा
या कूँची में रंगों ही का स्वर्ण-वितान बनाऊँ ।
साधन इतनें नहीं कि पत्थर के प्रसाद खड़े कर-
तेरा, अपना और प्यार का नाम अमर कर जाऊँ।
पर वह क्या कम कवि है जो कविता में तन्मय होवे
या रंगों की रंगीनी में कटु जग-जीवन खोवे ?
हो अत्यन्त निमग्न, एकरस, प्रणय देख औरों का-
औरों के ही चरण-चिह्न पावन आँसू से धोवे?
हम-तुम आज खड़े हैं जो कन्धे से कन्धा मिलाये,
देख रहे हैं दीर्घ युगों से अथक पाँव फैलाये
व्याकुल आत्म-निवेदन-सा यह दिव्य कल्पना-पक्षी:
क्यों न हमारा ह्र्दय आज गौरव से उमड़ा आये!
मैं निर्धन हूँ,साधनहीन ; न तुम ही हो महारानी,
पर साधन क्या? व्यक्ति साधना ही से होता दानी!
जिस क्षण हम यह देख सामनें स्मारक अमर प्रणय का
प्लावित हुए, वही क्षण तो है अपनी अमर कहानी !
रचनाकाल/स्थल : २० दिसम्बर १९३५, आगरा
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अज्ञेय
7/10/2007
करघा : रामधारी सिंह ’दिनकर’
हर ज़िन्दगी कहीं न कहीं
दूसरी ज़िन्दगी से टकराती है।
हर ज़िन्दगी किसी न किसी
ज़िन्दगी से मिल कर एक हो जाती है ।
ज़िन्दगी ज़िन्दगी से
इतनी जगहों पर मिलती है
कि हम कुछ समझ नहीं पाते
और कह बैठते हैं यह भारी झमेला है।
संसार संसार नहीं,
बेवकूफ़ियों का मेला है।
हर ज़िन्दगी एक सूत है
और दुनिया उलझे सूतों का जाल है।
इस उलझन का सुलझाना
हमारे लिये मुहाल है ।
मगर जो बुनकर करघे पर बैठा है,
वह हर सूत की किस्मत को
पहचानता है।
सूत के टेढ़े या सीधे चलने का
क्या रहस्य है,
बुनकर इसे खूब जानता है।
’हारे को हरिनाम’ से
Labels:
दिनकर
6/11/2007
क्यों कि तुम हो : अज्ञेय
मेघों को सहसा चिकनी अरुणाई छू जाती है
तारागण से एक शान्ति-सी छन-छन कर आती है
क्यों कि तुम हो।
फुटकी सी लहरिल उड़ान
शाश्वत के मूक गान की स्वर लिपि-सी संज्ञा के पट पर अँक जाती है
जुगनू की छोटी-सी द्युति में नये अर्थ की
अनपहचाने अभिप्राय सी किरण चमक जाती है
क्यों कि तुम हो।
जीवन का हर कर्म समर्पण हो जाता है
आस्था का आप्लवन एक संशय के कल्मश धो जाता है
क्यों कि तुम हो।
कठिन विषमताओं के जीवन में लोकोत्तर सुख का स्पन्दन मैं भरता हूँ
अनुभव की कच्ची मिट्टी को तदाकार कंचन करता हूँ
क्यो कि तुम हो।
तुम तुम हो;मैं -क्या हूँ ?
ऊँची उड़ान, छोटे कृतित्व की लम्बी परम्परा हूँ,
पर कवि हूँ, स्रष्टा, दृष्टा, दाता :
जो पाता हूँ अपने को भठ्टी कर उसे गलाता-चमकाता हूँ
अपने को मट्टी कर उस का अंकुर पनपाता हूँ
पुष्प-सा सलिल-सा,प्रसाद-सा,कंचन-सा,शस्य-सा,पुण्य-सा,
अनिर्वच आह्लाद-सा लुटाता हूँ
क्यों कि तुम हो।
सृजन स्थल: दिल्ली-इलाहाबाद ( रेल में )
१८ अक्टूबर १९५८
तारागण से एक शान्ति-सी छन-छन कर आती है
क्यों कि तुम हो।
फुटकी सी लहरिल उड़ान
शाश्वत के मूक गान की स्वर लिपि-सी संज्ञा के पट पर अँक जाती है
जुगनू की छोटी-सी द्युति में नये अर्थ की
अनपहचाने अभिप्राय सी किरण चमक जाती है
क्यों कि तुम हो।
जीवन का हर कर्म समर्पण हो जाता है
आस्था का आप्लवन एक संशय के कल्मश धो जाता है
क्यों कि तुम हो।
कठिन विषमताओं के जीवन में लोकोत्तर सुख का स्पन्दन मैं भरता हूँ
अनुभव की कच्ची मिट्टी को तदाकार कंचन करता हूँ
क्यो कि तुम हो।
तुम तुम हो;मैं -क्या हूँ ?
ऊँची उड़ान, छोटे कृतित्व की लम्बी परम्परा हूँ,
पर कवि हूँ, स्रष्टा, दृष्टा, दाता :
जो पाता हूँ अपने को भठ्टी कर उसे गलाता-चमकाता हूँ
अपने को मट्टी कर उस का अंकुर पनपाता हूँ
पुष्प-सा सलिल-सा,प्रसाद-सा,कंचन-सा,शस्य-सा,पुण्य-सा,
अनिर्वच आह्लाद-सा लुटाता हूँ
क्यों कि तुम हो।
सृजन स्थल: दिल्ली-इलाहाबाद ( रेल में )
१८ अक्टूबर १९५८
5/25/2007
नव दृष्टि : सुमित्रानंदन पंत,( जन्म-२० मई,१९००)
खुल गये छन्द के बन्ध ,
प्रास के रजत पाश,
अब गीत मुक्त,
औ’ युग-वाणी बहती अयास !
बन गये कलात्मक भाव
जगत के रूप-नाम,
जीवन-संघर्षण देता सुख,
लगता ललाम!
सुन्दर, शिव,सत्य
कला के कल्पित माप-मान
बन गये स्थूल,
जग-जीवन से हो एकप्राण!
मानव स्वभाव ही
बन मानव-आदर्श सुकर
करता अपूर्ण को पूर्ण,
असुन्दर को सुन्दर !
"संयोजिता" से
प्रास के रजत पाश,
अब गीत मुक्त,
औ’ युग-वाणी बहती अयास !
बन गये कलात्मक भाव
जगत के रूप-नाम,
जीवन-संघर्षण देता सुख,
लगता ललाम!
सुन्दर, शिव,सत्य
कला के कल्पित माप-मान
बन गये स्थूल,
जग-जीवन से हो एकप्राण!
मानव स्वभाव ही
बन मानव-आदर्श सुकर
करता अपूर्ण को पूर्ण,
असुन्दर को सुन्दर !
"संयोजिता" से
आशी: - त्रिलोचन
पृथ्वी से
दूब की कलाएँ लो
चार
ऊषा से
हल्दिया तिलक
लो
और
अपनें हाथों में
अक्षत लो
पृथ्वी आकाश
जहाँ कहीं
तुम्हें जाना हो
बढ़ो
बढ़ो
('अरधान' से )
त्रिलोचन पर एक लेख
दूब की कलाएँ लो
चार
ऊषा से
हल्दिया तिलक
लो
और
अपनें हाथों में
अक्षत लो
पृथ्वी आकाश
जहाँ कहीं
तुम्हें जाना हो
बढ़ो
बढ़ो
('अरधान' से )
त्रिलोचन पर एक लेख
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